mati ki bani

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Ashok Choudhary, Jagran


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बुद्ध की धरती रो रही है

Posted On: 21 Feb, 2010  
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गोरख के गांव में गूंजे गोरख के गीत

Posted On: 30 Jan, 2010  
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हाथी आया हाथी आया

Posted On: 23 Jan, 2010  
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जनतंत्र के खेल में तमाशबीन जन

Posted On: 8 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 8 Jan, 2010  
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साथी एक शेर याद आता है वो खूबसूरती से इरादों की बात करता है, वो पतझड़ में गुलाबों की बात करता है एक ऐसे दौर में जब नींद बहुत मुश्किल है, अजीब शख्‍स है ख्‍वाबों की बात करता है तुम्‍हारे फुलमतिया की चिंता तो सरकार को है नहीं अब उसकी बकरी और अंसारी की गाय को कौन पूछे। अब क्‍या करें बस नहीं चलता उनका नहीं तो संसद भवन को गिरवाकर माल बनवा देते और राष्‍टपति भवन में कई एकड़ में फैला मुगल गार्डन रीयल इस्‍टेट को सौंप कर एकाध अर्पाटमेंट अपने नाम करा लेते बेचारे। दरअसल व्‍यवस्‍था जो कर रही है वह उसका करेक्‍टर है लेकिन हम अपनी राह नहीं चुन पा रहे हैं। आज जमीन पर पड़ी तो फुलमतिया जान लेने व देने पर तुल आयी लेकिन जब हुक्‍मरानों के चुनने की बारी आती है तो न फुलमतिया को अपनी बकरी से फुरसत मिलती है और न हमें आपको अपनी मस्‍ती से। आप भाई बोया पेड़ बबूल का तो काटोगे क्‍या आम।

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अशोक जी इस लेख के लिए धन्‍यवाद। आपने जिस संवेदनशीलता के साथ अहिंसा की धरती पर सरकारी हिंसा के शिकार लोगों का दर्द महसूस किया है, उसी तल पर उसे शब्‍द देने में भी समर्थ रहे हैं। एक गरीब की थाती उसकी जमीन ही है, वह जमीन भूमि का सिर्फ एक टुकडा नहीं बल्कि अपने दोस्‍त किसान के जीवन गाथा की साक्षी होती है, उसके छिन जाने की भरपाई मुआवजा या अन्‍य प्रलोभन नहीं कर सकते। शुभ यह है कि किसान इस बात को समझने लगे हैं और इसके विरोध में मुखर भी हो रहे हैं। दूसरी बडी बात यह है कि विकास के लिए किसान ही क्‍यों बलि देगा। अशोक भाई आपने जिस शिद़दत के साथ इस मामले को उठाया है, यह आवाज पूरे हिन्‍दुस्‍तान की आवाज बने, इसके लिए भी प्रयास करने जरूरत है।

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के द्वारा: Ashok Choudhary, Jagran Ashok Choudhary, Jagran




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